
रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरियाकला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने श्रीमद्भागवत के प्रसंग में पूतना वध में प्रकाश डालते हुए बताया कि पूतना अविद्या का स्वरूप है। अनित्य, अशुचि दुख,व अनात्म पदार्थ को अभी अविद्या कहते हैं पूतना का रूप अमंगल था, उसे मुक्ति नहीं मिलना चाहिए थी किंतु वह *श्रीजी(लक्ष्मी)* का रूप धारण करके भगवान श्री कृष्ण के पास चली गई इसी से भगवान श्री कृष्ण ने प्रसन्न होकर उसे *सद्गति* प्रदान कर दी। श्री जी का रूप धारण करना मंगलप्रद होता है। साक्षात् लक्ष्मी का दर्शन लोक में बडा दुर्लभ होता है, इसी श्री रूप के कारण पूतना को मुक्ति प्राप्त हुई।
उन्होंने कहा भगवान श्री कृष्ण अग्नि के समान अपनी आभा को छुपा कर शैया पर विराजमान थे, अग्नि के सामने विष या दुर्विषय का प्रभाव नहीं होता है।
पूतना को देखकर के यशोदा आश्चर्यचकित रह गई उनकी दृष्टि श्री कृष्ण से हटकर पूतना पर चली गई यह बात भगवान को पसंद नहीं आई उन्होंने निश्चय किया कि जिस पर भक्त की दृष्टि होती है उसकी गोद में मेरा जाना आवश्यक है, इसी भाव सेभावित होकर भगवान श्री कृष्ण पूतना की गोद में चले गए। यह किसी दूसरे बालक का अनिष्ट न करें इसके लिए मेरी और आकर्षित होना भी अपेक्षित है यही विचार करके भगवान श्री कृष्ण ने अपने नेत्र बंद कर लिए। भगवान ने नेत्र इसलिए भी बंद कर लिए इस जन्म में तो उसने कोई साधन किया नहीं है, किंतु पूर्व जन्म में यदि कोई साधन किया हो तो उसे देखने के लिए भगवान ने नेत्र बंद कर लिए। भगवान के नेत्र बंद करने के अनेक भाव भक्तों ने व्यक्त किए हैं। बालकों का सहज स्वभाव होता है कि अपरिचित व्यक्ति को देखकर नेत्र बंद कर लेते इसलिए भगवान ने नेत्र बंद कर लिए।
कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने यजमान भारत भूषण शर्मा से श्रीमद्भागवत की पोथी का पूजन करके आरती संपन्न कराई।









