रायपुर:शंकराचार्य आश्रम में चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने शिव पुराण की कथा को विस्तार देते हुए बताया कि भगवान शिव के भक्तों को शनि की पीडा नहीं होती है।
महाराज श्री ने दधीचि के पुत्र पिप्पलाद जो साक्षात शंकर के अवतार थे।पिप्पलाद के प्रसंग में बताया की दैत्यों के अत्याचार से मुक्ति पाने तथा वृत्रासुर के वध की कामना से अस्थि मांगने गए दधीचि के पास समस्त देवता कहने लगे कि भगवन! इसमें संदेह नहीं है कि मांगने वाले लोग स्वार्थी होते हैं वे देने वाले की कठिनाई का विचार करने की बुद्धि नहीं रखते हैं यदि उनमें इतनी समझ होती तो वह मांगते ही क्यों? इसी प्रकार दाता भी मांगने वाले की विपत्ति नहीं जानता है अन्यथा उसके मुंह से कदापि न नही निकलता। इसलिए आप हमारी विपत्ति को समझ कर हमारी याचना को पूर्ण कीजिए।
दधीचि ऋषि ने प्रसन्नता के साथ कहा की जो प्राणी इस विनाशी शरीर से दुखी प्राणियों पर दया ना करके मुख्यतः इस शरीर से धर्म और यश का संपादन नहीं करता है वह पेड- पौधों से भी गया गुजरा है।
जगत के धन-जन और शरीर आदि पदार्थ क्षणभंगुर हैं यह अपने किसी काम नहीं आते, अंत में दूसरों के ही काम आएंगे इसीलिए मरणधर्मा मनुष्य को इनके द्वारा दूसरों का उपकार कर लेना चाहिए। लीजिए मैं अपने प्यारे शरीर को आप लोगों के लिए अभी छोड़ देता हूं क्योंकि एक दिन यह स्वयं ही मुझे छोड़ने वाला है। ऐसा कहकर दधीचि ने अपने शरीर का परित्याग कर दिया उनकी पत्नी सुवर्चा ने यह देखकर देवताओं को साप दिया और सती होने का निश्चय किया किंतु आकाशवाणी के द्वारा उनको पता चला कि उनके उदर में साक्षात भगवान शिव विराजमान है।
पिप्पलाद के रूप में भगवान शिव अवतरित हुए। संसार के अनिवारणीय शनि पीड़ा को देखकर के उन्होंने प्रीति पूर्वक प्राणियों को वरदान दिया कि 16 वर्ष की अवस्था तक शिव भक्तों को शनि की पीड़ा नहीं रहेगी यह मेरा वचन सत्य होगा। मेरे इस वचन का निरादर करके यदि शनि उन मनुष्यों को पीड़ा पहुंचाएगा तो वह उसी समय भस्म हो जाएगा इसमें संदेह नहीं। उन्हीं के बचन के अनुसार शनि आज भी 16 वर्ष तक के प्राणियों को पीडा नहीं पहुंचता।
गाधि, कौशिक एवं महामुनि पिप्पलाद इन तीनों महामुनियों के स्मरण करने से भी शनैश्चर की पीड़ा दूर हो जाती है।
कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने शिव पूजन करके आरती संपन्न की तत्पश्चात जगद्गुरु कुलम् के छात्रों ने वैदिक मंगलाचरण संपन्न किया।









