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रायपुर: शंकराचार्य आश्रम बोरिया कला में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला को गति देते हुए शिव पुराण की कथा के प्रसंग में श्री शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ. स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने बताया कि परमेश्वर सदाशिव का संकल्प कभी पराधीन नहीं होता है। त्रिपुरासुर की कथा के प्रसंग को विस्तार देते हुए महाराज ने बताया कि भगवान शिव ने पृथ्वी को रथ बनाया ब्रह्मा जी को सारथी बनाया और भगवान विष्णु को बाण बनाकर के त्रिपुरासुर और उसकी नगरी को जलाने के लिए सौ हजार वर्ष पर्यंत इंतजार किया शिवजी के अंगूठे में गणेश जी विराजमान हो चुके थे जो विघ्न उपस्थित कर रहे थे अतः आकाशवाणी हुई कि आप गणेश का पूजन कीजिए गणेश जी के पूजन के पश्चात भगवान शिव ने त्रिपुरासुर और उसकी नगरी को राख कर दी, वास्तव में भगवान शिव सर्व समर्थ हैं,वे भगवान शिव मन से ही सारे चराचर जगत को जलाकर राख करने की सामर्थ रखते हैं उन्हें रथ, वाण और गणों की आवश्यकता नहीं है। फिर भी देवताओं और भक्तों की इच्छा को ध्यान में रखकर भगवान शिव युद्ध आयुधों को धारण करते हैं यह उनकी लीला ही है। लीला का प्रदर्शन करते हुए भगवान शिव देवताओं से कहते हैं कि यदि आप लोग मुझे पशुओं का अधिपति बना दें तो मैं असुरों का वध करूं? भगवान शिव की बात सुनकर के देवता शसंकित हो गए तब भगवान शिव ने समझाया की पशु भाव को प्राप्त होने पर भी आप लोगों का पात (पतन) नहीं होगा। जो मेरे दिव्य पाशुपत व्रत का आचरण करेगा वह पशु भाव से मुक्त हो जाएगा।
कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम की वैदिक विद्वानों ने शिव पूजन पूर्वक आरती की तथा जगद्गुरु कुलम् के छात्रों तथा अध्यापकों ने वैदिक मंगलाचरण किया।








