
Oplus_0
रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम में चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रमुख डॉ.स्वामी इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने शिव पुराण की कथा का व्याख्यान करते हुए कहा कि माता श्रेष्ठ होती है पिता से। इसलिए वेद भगवान उपदेश देते हैं और कहते हैं।(मातृ देवो भव) “तू माता का भक्त बन”।प्रथम परिचय प्राणी का माता से ही होता है और माता के द्वारा ही पिता का ज्ञान कराया जाता है अतः माता सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। धर्मशास्त्र के अनुसार दस उपाध्यायों की अपेक्षा एक आचार्य श्रेष्ठ होता है, क्योंकि आचार्य अनुभवशील होता है, और सैकड़ो आचार्य की अपेक्षा एक पिता श्रेष्ठ होता है, और हजारों पिता मिलकर भी एक माता की बराबरी नहीं कर सकते है। अतः माता सर्वश्रेष्ठ और पूज्य मानी जाती है। उन्होंने कहा माता की आज्ञा का उल्लंघन कदापि व्यक्ति को नही करना चाहिए। गणेश जन्म की कथा के प्रसंग में महाराज श्री ने आगे कहा कि भवानी पार्वती जी ने मन में विचार किया कि हमारा भी कोई व्यक्तिगत सेवक होना चाहिए जो हमारी बात माने इस बात को ध्यान में रखकर उन्होंने अपने मल से एक पुत्र को तैयार किया और हाथ में दंड देकर आदेश दिया कि तुम द्वारपाल बन जाओ भगवान शिव के गण एवं स्वयं भगवान पराम्बा मां भगवती पार्वती की यहां प्रवेश करना चाह रहे थे किंतु गणेश जी ने मना कर दिया इस समय आप अंतःपुर में प्रवेश नहीं कर सकते हैं माता की आज्ञा नहीं हैं। जब तक माता की आज्ञा नहीं होगी तब तक आप प्रवेश नहीं कर सकते है। भगवान शिव ने अपना परिचय देते हुए कहा कि मैं शिव हूं पार्वती का पति हूं मुझे जाने का पूर्ण अधिकार है किंतु गणेश जी ने शिव जी के आदेश का उल्लंघन करके माता के आदेश को ही स्वीकार किया तथा सर्वोपरि माना। भगवान रामचंद्र ने भी माता की आज्ञा को सर्वश्रेष्ठ माना और माता की आज्ञा में ही पिता की आज्ञा को समाहित समझा और उसे स्वीकार करके वन में चले गए।कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने भगवान शिव का पूजन किया तथा आरती संपन्न कराई।









