रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम बोरिया में चल रहे चातुर्मास प्रवचन माला के क्रम को गति देते हुए शंकराचार्य आश्रम के प्रभारी डॉ.इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने शिव पुराण की कथा के प्रसंग में बताया कि काम संकल्प से उत्पन्न होता है, जब तक व्यक्ति मन में इच्छा नहीं रखता है तब तक काम की उत्पत्ति नहीं होती है। काम इच्छा रूप है, काम संकल्प और विकल्प के रूप में ही होता है। उन्होंने कहा काम अनेक दुर्गुणों का समूह है, काम से क्रोध की उत्पत्ति होती है, क्रोध से सम्मोह (अत्यधिक मोह) होता है और अत्यधिक मोह के होने से बुद्धि भ्रष्ट होती है और बुद्धि भ्रष्ट होने से व्यक्ति का नाश हो जाता है। अपने खुद के विनाश से बचने के लिए काम का परित्याग कर देना चाहिए काम सर्वथा अनर्थकारी है।
डॉ.इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने कहा काम यदि पूर्ण हो गया तो लोभ बढ़ जाता है, और काम यदि पूर्ण नहीं हुआ तो क्रोध बढ़ जाता दोनों ही प्रकार से काम व्यक्ति के लिए अनर्थ अमंगल है। काम जिससे उत्पन्न होता है, अपने उसी मूल को ही मोहित कर लेता है। उन्होंने कहा सुधि वक्ता ने काम की उत्पत्ति की कथा बताते हुए बताया कि काम की उत्पत्ति ब्रह्मा जी से हुई थी तथा काम ने प्रथम ही ब्रह्मा जी को मोहित किया। ब्रह्मा जी से उत्पन्न संध्या पर भी उनकी को दृष्टि चली गई काम को विश्वास हो गया कि अब मैं संसार के सभी प्राणियों को मोहित कर सकता हूं जिससे उत्पन्न हुआ हूं इस ब्रह्मा को मैंने मोहित कर लिया है। धर्मराज यह दृश्य देखकर दुखी हुए उन्होंने भगवान शंकर से प्रार्थना की भगवान शिव आए, भगवान शिव ने ब्रह्मा जी को समझाया कि आप वेद मार्ग को जानने वाले हैं आपको धैर्य धारण करना चाहिए। धैर्य धर्म का लक्षण है जिसका आश्रय लेकर व्यक्ति काम आदि विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है।
डॉ.इन्दुभवानन्द तीर्थ महाराज ने कहा भगवान शिव के वचनों को सुनकर के ब्रह्मा जी को लज्जा आई लज्जा से उनके शरीर से पसीना गिरा और उसे पसीने से पितरों की उत्पत्ति हो गई इस प्रकार संध्या पितरों को उत्पन्न करने वाली बन गई।कथा के पूर्व शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों एवं जगतगुरु कुलम के छात्रों ने शिवजी का विधिवत पूजन करके आरती की तत्पश्चात कथा प्रारंभ हुई








