रायपुर:राजधानी के शंकराचार्य आश्रम में चातुर्मास प्रवचन माला के अंतर्गत स्वामी डॉ. इन्दुभवानन्द तीर्थ जी महाराज ने शिव पुराण की कथा को विस्तार देते हुए बताया कि शिवलिंग साक्षात परम ब्रह्म परमात्मा का प्रतीक है भगवान शिव का समस्त पूजन लिंग में ही होता है शिवलिंग में ही शिव जी का पूजन करना चाहिए लिंग का अर्थ पहचान होती है जो परमात्मा की पहचान है वही लिंग है।उन्होंने कहा लिंग का अर्थ पहचान और शिव का मतलब कल्याण, जो कल्याण की पहचान है निः श्रेयस पदार्थ की प्राप्ति का मार्ग है उसे ही शिवलिंग कहते हैं। इसलिए संस्कृत में उसकी व्याख्या करते हुए बताया है “लीनं अर्थं गमयतीति लिंग” अर्थात् जो परब्रह्म की पहचान हो, लोक कल्याण का चिन्ह हो उसे ही शिवलिंग कहते हैं। हम लोगों को संस्कृत का मूल ज्ञान न होने के कारण विधर्मी शिवलिंग की गलत व्याख्या करके हमारे हमारी श्रद्धा को विकृत करने का कुत्सित प्रयास करते हैं ऐसे विधर्मियों से हमको सतर्क रहना चाहिए। महाराज श्री ने आगे बताया कि अहंकारी व्यक्ति कभी अपने जीवन में सफल नहीं होता है ब्रह्मा जी को भी सृष्टि विषयक अहंकार हो गया और वह भगवान विष्णु के पास जाकर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। श्रेष्ठता को लेकर आपस में विवाद हुआ युद्ध की स्थिति बन गई देवताओं ने शिवजी से युद्ध रोकने की प्रार्थना की। भगवान शिव युद्ध स्थल में पहुंचे अपने आप को अत्यंत विशाल अग्नि स्तंभ लिंग के रूप में प्रकट किया तथा आकाशवाणी हुई की जो इस लिंग के आदि अंत को जान लेगा वह श्रेष्ठ सिद्ध हो जाएगा आकाशवाणी को सुनकर के ब्रह्मा हंस के रूप में आकाश की ओर और विष्णु वाराह के रूप में पाताल की और प्रविष्ट हुए भगवान विष्णु जानते थे कि भगवान शिव की माया है इसका आदि अंत और मध्य नहीं जाना जा सकता है वे लौटकर के वापस आ गए किंतु ब्रह्मा जी को तो अत्यंत अहंकार था अहंकार के वशीभूत होकर उन्होंने केतकी पुष्प को साक्षी बनाकर भगवान शिव के समक्ष मिथ्या भाषण किया भगवान शिव ने ब्रह्मा जी का पांचवा सिर काटा और शाप दिया कि तुम्हारी मृत्यु लोक में कहीं कोई पूजन नहीं होगी तथा केतकी तुम मेरी पूजन से बहिष्कृत रहोगी इस प्रकार से भगवान विष्णु शिव की कृपा के भाजन हो गए और ब्रह्मा जी अहंकार के वशीभूत होकर भगवान शिव की कृपा से वंचित हो गए अहंकारी व्यक्ति कभी भी अपने कार्य में सफल नहीं होता है और न कभी सम्मान का अधिकारी होता है। कथा के पूर्व श्री शंकराचार्य आश्रम के वैदिक विद्वानों ने मंगलाचरण करके भगवान शंकर की आरती की तत्पश्चात पूज्य स्वामी जी ने भगवान की शिवपुराण की दिव्य अमृतमयी कथा समस्त भक्तों को सुनाई।

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