रायपुर:



राजिम में आयोजित कुंभ कल्प में संत समागम के दौरान राम चरित मानस की चौपाई ‘मुद मंगलमय संत समाजू, जो जग जंगम तीरथराजू’ की प्रासंगिकता को उपस्थित जनसमूह ने साक्षात्कार किया। जब त्रिवेणी संगम के तट पर बने विशाल मंच पर देशभर के संतों का आगमन हुआ। यूं भी संत और तीरथ एक दूसरे के पर्याय हैं। संत के बिना किसी तीरथ का और तीरथ के बिना किसी संत का महत्व नहीं रह जाता। राजिम अपने आप में एक तीर्थ के सामान स्थापित है। जिसकी धरा से निकलने वाली श्रद्धा और आस्था के लिए यहां आने वाले हर श्रद्धालुओं को साकारात्मक गतिज और ऊर्जा से भर देती है। साथ ही त्रिवेणी संगम की स्वर लहरियों के साथ जब भगवान श्री राजीव लोचन की आरती में बजने वाली घंटे-घड़ियाल की आवाज के साथ ताल में ताल मिलकर मग्न होकर नाचती है, उस अलौकिक भावना के भाव का साक्षातकार बहुत ही कम लोगों को ही मिल पाता है, जिसकी जितनी श्रद्धा भाव होते हैं, उसे उसी भाव से उस अलौकिक आनंद की अनुभूति होती है।








