रायपुर:डूण्डा कौशल्या माता बिहार में साहू परिवार एवं समाज की ओर से चल रही श्रीमद्भागवत की दिव्य अमृतमयी कथा को विस्तार देते हुए परम पूज्य ज्योतिष्पीठाधीश्वर एवं द्वारका शारदा पीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी श्री स्वरूपानंद सरस्वती जी महाराज के परम प्रिय शिष्य डॉ. इन्दुभवानन्द महाराज ने रास रहस्य के प्रसंग में बताया कि त्याग सबसे बड़ी तपस्या है गोपियों ने श्री कृष्ण के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सभी कामनाओं का त्याग कर दिया था और त्याग करके कोई पाप नहीं किया था, परंतु श्री कृष्ण ने उनको बिल्कुल अपराधिनी सिद्ध कर दिया। क्यों अपराधिनी सिद्ध कर दिया इसलिए कि उनके हृदय में श्री कृष्ण के प्रति कितना प्रेम है यह बात सब लोगों को मालूम हो जाए वह भी दूसरों के मुंह से नहीं स्वयं गोपियों के मुंह से मालूम हो कि वे श्री कृष्ण से कितना प्रेम करती हैं। इसलिए भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों को उकसा कर उन्हीं के मुंह से अपने प्रेम का वर्णन करवाते हैं। जब सामने वाले के भाव के विपरीत कोई बात कही जाती है तब उसके मन में जो छुपा हुआ होता है वह प्रकट हो जाता है। इसमें कोई संदेह की बात नहीं है कि गोपियों के हृदय में श्री कृष्ण के प्रति कितना प्रेम है, यह बात प्रगट ही न होती यदि श्री कृष्ण उन्हें लौटने के लिए न कहा होता। गोपियां श्री कृष्ण का विपरीत भाषण सुनकर विषाद ग्रस्त हो गई वे मर भी नहीं सकती थी और जी भी नहीं सकती थी। यदि वे मर जाएं तो उनके प्यार श्याम सुंदर को बड़ा दुख होगा और यदि जीवित रहेगी तो स्वयं बड़ी दुखी होगी इस प्रकार गोपियां चिंता के अथाह समुद्र में मग्न हो गई। आगे सुधि वक्ता ने रुक्मणी मंगल के प्रसंग में बताया की विवाह धार्मिक संस्कार है जो हमको पितृ ॠण मुक्त करता है मनुष्य जन्मजात ऋणी होता है, पुत्र के उत्पन्न होने से पितृ ऋण से मुक्ति होती है। कथा के पूर्व यजमान सुंदरलाल साहू श्रीमती विद्या साहू, रघुनाथ साहू, सुखदेव साहू आदि ने भागवत भगवान की पोथी का पूजन कर आरती उतारी। आज की कथा में विशेष रूप से नंदकुमार देवांगन भरत साहू राधे साहू गंगा साहू आदि श्रद्धालु जन उपस्थित थे।

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